एक रहस्यमय कल्पना लोक- बटेश्वर मंदिर समूह



बटेश्वर के मंदिर समूह
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राजस्थान और मध्यप्रदेश का सीमावर्ती प्रदेश जिसे सरसब्ज़ करती है माँ चर्मन्यवति यानी की चंबल। चंबल के कटाव के कारण यहाँ का भौतिक प्रदेश एक अलग ही विशेषता युक्त है। उबड़-खाबड़ और कटी-फटी घाटियां यहां एक विशाल क्षेत्र में फैली हुई हैं। इन्हें ही चंबल के बीहड़ कहा जाता है। ये बीहड़ एक विस्तृत भूल-भुलैया का निर्माण करते हैं इसलिए कुछ समय पहले तक यह स्थान दस्युओं का पंसदीदा स्थल था।

इन्हीं खतरनाक बीहड़ों में ग्वालियर और मुरैना से लगभग 30 किलोमीटर दूर बीहड़ों के बीच घने जंगलों में बसा हुआ है बटेश्वर मंदिर समूह का अद्भुत सौन्दर्यलोक। गुर्जर-प्रतिहार कालीन लगभग दो सौ मंदिरों का यह मंदिर समूह गुर्जर-प्रतिहार कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस मंदिर समूह के सबसे प्राचीन मंदिर लगभग सातवीं या आठवी शताब्दी के चिन्हित किये गए हैं।

स्थानीय किवदंतियों के अनुसार यह स्थान प्राचीन काल मे गुरुकुल था। यहाँ अक्सर राजकुमार शिक्षा ग्रहण करनें के लिए आया करते थे और शिक्षा पूर्ण करनें के उपरांत वापिस घर जाते समय वे एक मंदिर का निर्माण स्मृति स्वरूप करवाते थे इसलिए ही बटेश्वर में इतनें मंदिर एक साथ मिलते हैं।

1882 ईस्वी में प्रसिद्ध पुरातत्ववेता जनरल अलेक्जेंडर कनिंघम में यहाँ का दौरा किया था। यहाँ के बारे में उन्होंने अपनें रिकॉर्ड में लिखा है कि " पराबली/पड़ावली के दक्षिण-पूर्व में लगभग 100 से भी अधिक छोटे- बड़े प्राचीन मंदिरों का एक खंडहर समूह है, जिसमें से अधिकतर मंदिर छोटे हैं"।

अपनें काल की यह वैभवशाली धरोहर खंडहरों में कैसे तब्दील हुई इसकी कोई प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं होती परंतु आधुनिक प्रमाणों से यह जानकारी अवश्य लगाई जाती है की लगभग 13 वी सदी के दौरान आये एक विनाशकारी भूकंप ने इन मंदिरों को पूर्णतया जमीदोंज कर दिया था। सिर्फ गिनती के ही मंदिर इस विनाशकारी भूकंप का सामना कर पाए पर वे भी लगभग अर्ध-क्षतिग्रस्त अवस्था में थे।

तब से लेकर लगभग 1924 तक ये मंदिर समूह लगभग भूले-बिसरे ही रहे। इसका एक कारण यह भी रहा की इस इलाके में दस्युओं का इतना आतंक था की पुरातत्व विभाग के अधिकारी भी इस इलाके में जानें से थर्राते थे। 1924 ईस्वी में भारतीय पुरातत्व विभाग ने इन मंदिर समूहों को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया लेकिन उसके बाद भी लगभग 81 साल तक यह स्थान पूर्णरूपेण उपेक्षित रहा। इनकी पहचान अब तक सिर्फ खंडहरों के ही रूप में थी।

सन 2005 में वक़्त ने करवट बदली। इस वर्ष भारतीय पुरातत्व विभाग के एक अधिकारी के. के. मोहम्मद यहाँ आये और इस अतुल्य संम्पदा की दुर्दशा को देखकर बहुत दुःखी हूए। बतौर एक पुरातात्विक व्यक्ति होनें के कारण के. के. मोहम्मद ने इन मंदिरों के पुनर्निर्माण को अपनें जीवन का ध्येय बना लिया।

◆कौन हैं के. के. मोहम्मद◆

शांत और सौम्य...धीमे बोलने वाले सांवले रंग और दरम्याने कद का एक ऐसा मुस्लिम शख्स जिसने प्राचीन मंदिरों को सहेजने में अपनी पूरी उम्र लगा दी..... पुरात्तव सर्वेंक्षण विभाग में उत्तर भारत के मुखिया के तौर पर 2012 में सेवानिवृत हो चुके के के मोहम्मद का नाम जब जब आएगा तब तब #बटेश्वेर के प्राचीन मंदिरों का जिक्र अवश्य होगा....!

90 के दशक में जब के.के. मोहम्मद ने पुरातत्व विभाग के तमाम नाज नखरे सह कर बटेश्वर के 200 मंदिरों के अवशेष के पास पहुंचे तब कोई नहीं कह सकता था कि गुप्त काल से लेकर गुर्जर प्रतिहार काल के 6 शताब्दी पुराने ये उत्कृष्ट मंदिर फिर खड़े हो पाएंगे.... लेकिन के के मोहम्मद पर तो जैसे जूनून सवार था इस विरासत को उसका पूर्व रूप देने का।

अपनें इस ड्रीम प्रोजेक्ट को मूर्त रूप देने से पहले मुरैना के खनन माफियाओं से लेकर निर्भय गुज्जर जैसे दुर्दांत डाकूओं से पार पाने की समस्या थी। निर्भय गुज्जर की यहाँ के मंदिरों में गहरीं आस्था थी। एक दिन मुलाकात के दौरान के के मोहम्मद ने उनसे कहा " निर्भय जी आप गुर्जर वंश के हो और ये मंदिर भी आपके पूर्वज गुर्जर- प्रतिहारों की धरोहर हैं। भावनात्मक रूप से जुड़ाव होने पर निर्भय गुर्जर ने सहर्ष ही भारतीय पुरातात्विक विभाग के अधिकारियों को यहाँ काम करने के लिए सहमति दे दी।

अब के के मोहम्मद के मार्ग की प्रथम बाधा दूर हो चुकी थी परंतु दूसरी सबसे बड़ी बाधा यह थी की लगभग खंडहर हो चुकी तराशे हुए पत्थरों की इस भूल- भुलैया में से एक एक पत्थर चुनकर इन मदिरों को मूलरूप में वापिस लाना निःसंदेह ही एक जटिल और बेहद दुष्कर कार्य था। परंतु अपनी धुन के पक्के मोहम्मद जी ने सभी बाधाओं का सामना करके बटेश्वर के 200 प्राचीन मंदिरों में से 60 मंदिर को उनके मूलरूप में खड़ा करके इतिहास को वर्तमान की दहलीज पर पहुंचा दिया.....।

अपने शानदार काम के लिए भारत सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से नवाजे गए केके मोहम्मद बताते हैं कि जब पहली बार वो बटेश्वर मंदिर समूह पहुंचे तो मंदिर के बचे अवशेष पर लंबी मूंछ और हाथ में बंदूक लिए एक शख्श मिला.....उसे जब पता चला कि वो इन मंदिरों का जीर्णोद्वार करने आए तो वह बहुत खुश हुआ..... बाद में लोगों ने बताया कि ये दुर्दांत डाकू निर्भय गुज्जर था..... डाकुओं और खनन माफियाओं के चलते मंदिर के जीर्णोद्वार का काम कोई करने को तैयार न था लेकिन केके मोहम्मद को अकेले काम करता देख लोगों का हौसला बढ़ा फिर इसका काम शुरु हुआ.....।

निसंदेह ही के के मोहम्मद जी ने इस ऐतिहासिक धरोहर को पुनर्जीवन दिया है। आज बटेश्वर मंदिर समूह एक महत्वपूर्ण पर्यटक स्थल है।

आप भी जाइये एक बार इस विरासत को देखनें...!

✍️:-
कुलदीप भार्गव

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